साहब मैं तो अपना
मकान देख कर भौंचक्का रह गया कि हम इसमें रहते थे और इससे जियादा हैरानी इस पर कि
बहुत खुश रहते थे। मिडिल क्लास गरीबी की सबसे दयनीय और असह्य किस्म वो है, जिसमें आदमी के पास कुछ न हो लेकिन उसे किसी चीज
की कमी महसूस न हो। ईश्वर की कृपा से हम तले-ऊपर के नौ भाई थे और चार बहनें, और तले-ऊपर तो मैंने मुहावरे की मजबूरी के कारण
कह दिया वरना खेल-कूद, खाने और लेटने-बैठने
के वक्त ऊपर-तले कहना जियादा सही होगा। सबके नाम त पर खत्म होते थे। इतरत, इशरत, राहत, फरहत, इस्मत, इफ्फत वगैरा। मकान खुद वालिद ने मुझसे बड़े भाई
की स्लेट पर डिजाइन किया था। सवा सौ कबूतर भी पाल रखे थे, हर एक की नस्ल और जात अलग-अलग। किसी कबूतर को
दूसरी जात की कबूतरी से मिलने नहीं देते थे। लकड़ी की दुकान थी। हर कबूतर की काबक
उसकी लंबाई बल्कि दुम की लंबाई-चौड़ाई और बुरी आदतों को ध्यान में रखते हुए खुद
बनाते थे। साहब अब जो जाके देखा तो मकान के आर्किटेक्चर में उनके फालतू शौक का
प्रभाव और दबाव नजर आया बल्कि यूं कहना चाहिये कि सारा मकान दरअस्ल उनके कबूतरखाने
की भौंडी सी नक्ल था। वालिद बहुत प्रैक्टिकल और दूर की सोचने वाले थे। इस भय से कि
उनकी आंख बंद होते ही औलाद घर के बंटवारे के लिए झगड़ा करेगी, वो हर बेटे के पैदा होते ही अलग कमरा बनवा देते
थे। कमरों के बनाने में खराबी की एक जियादा सूरत छिपी हुई थी, यानी बड़े-छोटे का लिहाज-पास था कि हर छोटे भाई
का कमरा अपने बड़े भाई के कमरे से लंबाई-चौड़ाई दोनों में एक-एक गज छोटा हो। मुझ
तक पहुंचते-पहुंचते कमरे की लंबाई-चौड़ाई तकरीबन पंजों के बल बैठ गयी थी। मकान
पूरा होने में पूरे सात साल लगे। इस अरसे में तीन भाई और पैदा हो गये। आठवें भाई
के कमरे की दीवारें उठायीं तो कोई नहीं कह सकता था कि कदमचों की नींव रखी जा रही है
या कमरे की। हर नवजात के आने पर स्लेट पर पिछले नक्शे में जुरूरी परिवर्तन और एक
कमरे में बढ़ोतरी करते। धीरे-धीरे सारा आंगन खत्म हो गया। वहां हमें विरसे में
मिलने वाली कोठरियां बन गयीं।
साहब! कहां कराची की
कोठी, उसके एयरकंडीशंड कमरे, कालीन, खूबसूरत
पेंट और कहां ये ढंढार कि खांस भी दो तो प्लास्टर झड़ने लगे। चालीस बरस से रंग
सफेदी नहीं हुई। फुफेरे भाई के मकान में एक जगह तिरपाल की छत बंधी देखी। कराची और
लाहौर में तो कोई छतगीरी और नमगीरी के अर्थ भी नहीं बता पायेगा।
छतगीरी पर तीन जगह
नेल पालिश से X का निशान बना है मतलब ये कि इसके नीचे न बैठो।
यहां से छत टपकती है। कानपुर और लखनऊ में जिस दोस्त और रिश्तेदार के यहां गया, उसे परेशान हाल पाया। पहले जो सफेदपोश थे, वो अब भी हैं मगर सफेदी में पैवंद लग गये हैं।
अपने स्वाभिमान पर कुछ जियादा ही घमंड करने लगे हैं। एक छोटी-सी महफिल में मैंने
इस पर उचटता सा जुमला कस दिया तो एक जूनियर लैक्चरर जो किसी स्थानीय कॉलेज में
इकोनोमिक्स पढ़ाते हैं, बिगड़ गये। कहने लगे
'आपकी अमीरी अमेरिका और अरब देशों की देन है।
हमारी गरीबी हमारी अपनी गरीबी है। (इस पर उपस्थित लोगों में से एक साहब ने गा कर
अल्हम्दुलिल्लाह कहा) कर्जदारी का सुख आप ही को मुबारक हो। अरब अगर थर्ड वर्ल्ड को
भिखारी कहते हैं तो गलत नहीं कहते।' मैं
मेहमान था उनसे क्या उलझता। देर तक जौ की रोटी, कथरी, चटायी, सब्र, गरीबी और स्वाभिमान की आरती उतारते रहे और इसी
तरह के शेर सुनाते रहे। लिहाज में मैंने भी दाद दी।
कोई चीज ऐसी नहीं जो
हिंदुस्तान में नहीं बनती हो। एक कानपुर ही क्या सारा देश कारखानों से पटा पड़ा
है। कपड़े की मिलें, फौलाद के कारखाने, कार और हवाई जहाज की फैक्ट्रियां। टैंक भी बनने
लगे। एटम बम तो बहुत दिन हुए फोड़ लिया। सैटेलाइट भी अंतरिक्ष में छोड़ लिया। अजब
नहीं कि चांद पर भी पहुंच जायें। एक तरफ तो ये है, दूसरी
तरफ ये नक्शा भी देखा कि एक दिन मुझे इनआमुल्ला बरमलाई के यहां जाना था। एक
पैडल-रिक्शा पकड़ी। रिक्शा वाला टी.बी. का मरीज लग रहा था। बनियान में से भी
पसलियां नजर आ रहीं थीं। मुंह से बनारसी किवाम वाले पान के भबके निकल रहे थे। उसने
उंगली का आंकड़ा-सा बना कर माथे पर फेरा तो पसीने की तलल्ली बंध गयी। पसीने ने
मुंह और हाथों पर लसलसी चमक पैदा कर दी थी जो धूप में ऐसी लगती थी जैसे वैसलीन लगा
रखा हो। नंगे पैर,
सूखी कलाई पर कलाई
से जियादा चौड़ी घड़ी, हैंडिल पर परवीन
बॉबी का एक सैक्सी फोटो। पैडिल मारने में दोहरा हो हो जाता और पीसने में तर माथा
बार-बार बॉबी पर सिजदे करने लगता। मुझे एक मील ढो कर ले गया मगर अंदाजा लगाइये
कितना किराया मांगा होगा? जनाब!
कुल पिचहत्तर पैसे, खुदा की कसम!
पिचहत्तर पैसे। मैंने उनके अलावा चार रुपये पच्चीस पैसे का टिप दिया तो पहले तो
उसे यकीन नहीं आया फिर बांछें खिल गयीं। कद्दू के बीज जैसे पान में लिथड़े दांत
निकले के निकले रह गये। मेरे बटुए को ललचाई नजरों से देखते हुए पूछने लगा, बाऊजी आप कहां से आये हैं? मैंने कहा - पाकिस्तान से। मगर 35 बरस पहले यहीं हीरामन के पुरवे में रहता था। उसने
पांच का नोट अंटी से निकाल कर लौटाते हुए कहा `बाबूजी
मैं आपसे पैसे कैसे ले सकता हूं? आपसे तो
मुहल्लेदारी निकली। मेरी खोली भी वहीं है।`
गरीब गुर्राने लगे
और आबादी, खुदा की पनाह। बारामासी मेले का-सा हाल है। जमीन
से उबले पड़ते हैं। बाजार में आप दो कदम नहीं चल सकते। जब तक कि दायें-बायें हाथ
और कुहनियां न चलायें। सूखे में खड़ी तैराकी कहिये। जहां कोहनी मारने की भी
गुंजाइश न हो वहां धक्के से पहुंच जाते हैं। लाखों आदमी फुटपाथ पर सोते हैं और
वहीं अपनी जीवन की सारी यात्रा पूरी कर लेते हैं, मगर
फुटपाथ पर सोने वाला किसी से दबता है-न डरता है, न सरकार
को बुरा कहने से पहले मुड़ कर दायें-बायें देखता है। हमारे जमाने के गरीब वास्तव
में दयनीय होते थे। अब गरीब गुर्राते बहुत हैं। रिक्शे को तो फिर भी रास्ता दे
देंगे मगर कार के सामने से जरा जो हट जायें।
अजीजुद्दीन वकील कह
रहे थे कि हमारे यहां राजनैतिक जागरूकता बहुत बढ़ गयी है। खुदा जाने, मैंने तो यह देखा कि जितनी गरीबी बढ़ती है उतनी
ही हेकड़ी भी बढ़ती जाती है। ब्लैक का पैसा वहां भी बहुत है, मगर किसी की मजाल नहीं कि बिल्डिंग में नुमाइश
करे। शादियों में खाते-पीते घरानों तक की औरतों को सूती साड़ी और चप्पलें पहने
देखा। मांग में अगर सिंदूर न हो तो विधवा-सी लगें। चेहरे पर बिल्कुल मेक-अप नहीं।
जबकि अपने यहां ये हाल कि हम मुर्गी की टांग को भी हाथ नहीं लगाते जब तक उस पर रूज
न लगा हो। साहब आपने तारिक रोड के लाल-भबूका चिकन सिकते देखे होंगे? कानपुर में मैंने अच्छे-अच्छे घरों में दरियां और
बेंत के सोफा-सेट देखे हैं और कुछ तो वही हैं जिन पर हम 35 साल पहले ऐंडा करते थे। साहब रहन-सहन के मामले
में हिंदुओं में इस्लामी सादगी पायी जाती है।
जो होनी थी सो बात हो
ली, कहारो!
कहने को तो आज भी
उर्दू बोलने वाले उर्दू ही बोलते हैं, मगर
मैंने एक अजीब परिवर्तन महसूस किया। आम आदमी का जिक्र नहीं, उर्दू के प्रोफेसरों और लिखने वालों तक का वो ढंग
नहीं रहा जो हम-आप छोड़ कर आये थे। करारापन, खड़ापन, वो कड़ी कमान वाला खटका चला गया। देखते-देखते
ढुलक कर हिंदी के पंडताई लहजे के करीब आ गया है `Sing-Song` लहजा You know what I mean. विश्वास न हो तो ऑल इंडिया रेडियो की उर्दू खबरों के लहजे की, कराची रेडियो या मेरे लहजे से तुलना कर लीजिये।
मैंने पाइंट आउट किया। इनामुल्ला बरमलाई सचमुच नाराज हो गये। अरे साहब! वो तो
आक्षेपों पर उतर आये। कहने लगे `और
तुम्हारी जुबान और लहजे पर जो पंजाबी छाप है तुम्हें नजर नहीं आती, हमें आती है। तुम्हें याद होगा 2 अगस्त 1947 को जब मैं तुम्हें ट्रेन पर सी-ऑफ करने गया तो तुम काली रामपुरी टोपी, सफेद चूड़ीदार पाजामा और जोधपुरी जूते पहने हाथ
का चुल्लू बना-बना कर आदाब-तस्लीमात कर रहे थे, कहो
हां! कल्ले में पान, आंखों में ममीरे का
सुरमा, मलमल के चुने हुए कुर्ते में इत्रे-गिल! कहो, हां! तुम यहां से चाय को चांय, घास को घांस और चावल को चांवल कहते हुए गये! कहो
हां! और जिस वक्त गार्ड ने सीटी बजायी तुम चमेली का गजरा गले में डाले थर्मस से
गरम चाय प्लेट में डाल कर, फूंकें
मार-मार कर सुटर-सुटर पी रहे थे। उस वक्त भी तुम कराची को किरांची कह रहे थे। कह
दो कि नहीं। और अब तीन Decades of decadence के बाद
सर पर सफेद बालों का टोकरा रखे, टखने तक
हाजियों जैसा झाबड़ा-झिल्ला कुर्ता पहने, टांगों
पर घेरदार शलवार फड़काते, कराची
के कंक्रीट जंगल से यहां तीर्थ यात्रा को आये हो तो हम तुम्हें पंडित-पांडे दिखाई
देने लगे। भूल गये? तुम यहां `अमां! और ऐ हजरत` कहते
हुए गये थे और अब सांईं-सांईं कहते लौटे हो।` साहब
मैं मेहमान था। बकौल आपके, अपनी
बेइज्जती खराब करवा के चुपके से उठकर रिक्शा में घर आ गया।
जो होनी थी सो बात
हो ली, कहारो
चलो ले चलो मेरी
डोली, कहारो
हम चुप रहे, हम हंस दिये
लखनऊ और कानपुर
उर्दू के गढ़ थे। अनगिनत उर्दू अखबार और पत्रिकायें निकलती थीं। खैर आप तो मान कर
नहीं देते। मगर साहब, हमारी जबान
प्रामाणिक थी। अब हाल यह है कि मुझे तो सारे शहर में एक भी उर्दू साइन बोर्ड नजर
नहीं आया। लखनऊ में भी नहीं। मैंने ये बात जिससे भी कही वो आह भर के या मुंह फेर
के खामोश हो गया। मत मारी गयी थी कि ये बात एक महफिल में दोहरा दी तो एक साहब बिखर
गये। शायद जहीर नाम है। म्यूनिस्पिलिटी के मैंबर हैं। वकालत करते हैं। न जाने कब
से भरे बैठे थे। कहने लगे `खुदा के
लिए हिंदुस्तानी मुसलमानों पर रहम कीजिये। हमें अपने हाल पर छोड़ दीजिये।
पाकिस्तान से जो भी आता है, हवाई
जहाज से उतरते ही अपना फॉरेन एक्सचेंज उछालता, यही
रोना रोता हुआ आता है। जिसे देखो, आंखों
में आंसू भरे शहर का मर्सिया पढ़ता चला आ रहा है। अरे साहब! हम आधी सदी से पहले का
कानपुर कहां से ला कर दें। बस जो कोई भी आता है, पहले तो
हर मौजूदा चीज की तुलना पचास बरस के पहले के हिंदुस्तान से करता है। जब ये कर
चुकता है तो आज के हिंदुस्तान की तुलना आज के पाकिस्तान से करता है। दोनों
मुकाबलों में चाबुक दूसरे घोड़े के मारता है, जितवाता
है अपने ही घोड़े को।` वो बोलते रहे। मैं
मेहमान था क्या कहता, वरना वही सिंधी
कहावत होती कि गयी थी सींगों के लिए, कान भी
कटवा आई।
लेकिन एक सच्चाई को
स्वीकार न करना बेईमानी होगी। हिंदुस्तान का मुसलमान कितना ही परेशान, बेरोजगार क्यों न हो, वो मिलनसार, मुहब्बत-भरा, स्वाभिमानी और आत्मविश्वासी है। नुशूर भाई से
लंबी-लंबी मुलाकातें रहीं। साक्षात् मुहब्बत, साक्षात्
प्यार, साक्षात् रोग। उनके यहां लेखकों और शायरों का
जमाव रहता है। पढ़े-लिखे लोग भी आते हैं। पढ़े-लिखे हैं मगर बुद्धिमान नहीं। सब एक
सुर में कहते हैं कि उर्दू बड़ी सख्त जान है। पढ़े-लिखे लोगों को उर्दू का भविष्य
अंधकारपूर्ण दिखाई देता है। बड़े-बड़े मुशायरे होते हैं। सुना है कि एक मुशायरे
में तो तीस हजार से जियादा श्रोता थे। साहब! मैं आपकी राय से सहमत नहीं कि जो शेर
एक साथ पांच हजार आदमियों की समझ में आ जाये वो शेर नहीं हो सकता, कोई और चीज है।
अनगिनत सालाना
कांफ्ऱैंस होती हैं। सुना है कई उर्दू लेखकों को पद्मश्री और पद्मभूषण के एवार्ड
मिल चुके हैं। मैंने कइयों से पद्म और भूषण के अर्थ पूछे तो जवाब में उन्होंने वो
रकम बतायी जो एवार्ड के साथ मिलती है। आज भी फिल्मी गीतों, द्विअर्थी डॉयलॉग, कव्वाली
और आपस की मारपीट की जबान उर्दू है। संस्कृत शब्दों पर बहुत जोर है मगर आप आम आदमी
को संस्कृत में गाली नहीं दे सकते। इसके लिए संबोधित का पंडित और विद्वान होना
जुरूरी है। साहब! गाली, गिनती और गंदा लतीफा
तो अपनी मादरीजबान में ही मजा देता है। तो मैं कह रहा था कि उर्दू वाले काफी
उम्मीद से भरे हैं। कठिन हिंदी शब्द बोलते समय इंदिरा गांधी की जुबान लड़खड़ाती है
तो उर्दू वालों को कुछ आस बंधती है।
कौन ठहरे समय के धारे
पर
नुशूर वाहिदी उसी
तरह तपाक और मुहब्बत से मिले। तीन-चार घंटे गप के बाद जब भी मैंने ये कह कर उठना
चाहा कि अब चलना चाहिये तो हाथ पकड़ कर बिठा लिया। मेरा जी भी यही चाहता था कि इसी
तरह रोकते रहें। याददाश्त खराब हो गयी है। एक ही बैठक में तीन-चार बार आपके बारे
में पूछा `कैसे हैं? सुना है
हास्य व्यंग्य लेख लिखने लगे हैं। भई हद हो गयी।` रोगी तो
आप जानते हैं सदा के थे। वज्न 75 पौंड रह
गया है। उम्र भी इतनी ही होगी। चेहरे पर नाक ही नाक नजर आती है। नाक पर याद आया, कानपुर में चुनिया केले, इसी साइज के अब भी मिलते हैं। मैंने खास तौर पर
फरमाइश करके मंगवाये। मायूसी हुई। अपने सिंध के चित्तीदार केलों के आसपास भी नहीं।
एक दिन मेरे मुंह से निकल गया कि सरगोधे का मालटा, नागपुर
के संतरे से बेहतर होता है, नुशूर
तड़प कर बोले `ये कैसे मुमकिन है?` वैसे नुशूर माशाअल्लाह चाक-चौबंद हैं। सूरत बहुत बेहतर हो गयी है।
इसलिए कि आगे को निकले हुए लहसुन की पोथी जैसे ऊबड़-खाबड़ दांत सब गिर चुके हैं।
आपको तो याद होगा, सुरैया एक्ट्रेस क्या कयामत का गाती थी? मगर लंबे दांत सारा मजा किरकिरा कर देते थे। सुना
है कि हमारे पाकिस्तान आने के बाद सामने के निकलवा दिये थे। एक फिल्मी मैगजीन में
उसका ताजा फोटो देखा तो खुद पर बहुत गुस्सा आया कि क्यों देखा? फिर उसी डर के मारे उसके रिकार्ड नहीं सुने। एजाज
हुसैन कादरी के पास उस जमाने के सारे रिकार्ड मय भोंपू वाले ग्रामोफोन के अभी तक
सुरक्षित हैं। साहब! विश्वास नहीं हुआ कि यह हमारे लिए साइंस, गायकी और ऐश की इंतहा थी। उन्होंने उस जमाने के
सुर-संगीत सम्राट सहगल के दो-तीन गाने सुनाये। साहब! मुझे तो बड़ा शॉक लगा कि
माननीय के नाक से गाये हुए गानों से मुझ पर ऐसा रोमांटिक मूड कैसे तारी हो जाता
था।
मोती बेगम का मुंह
झुरिया कर बिल्कुल किशमिश हो गया है। नुशूर कहने लगे, मियां तुम औरों पर क्या तरस खाते फिरते हो। जरा
अपनी सूरत तो 47
के पासपोर्ट फोटो से
मिला कर देखो। कोई अखिल भारतीय मुशायरा ऐसा नहीं होता, जिसमें नुशूर न बुलाये जायें। शायद किसी शायर को
इतना पारिश्रमिक नहीं मिलता, जितना
उन्हें मिलता है। बड़ी इज्जत की नजर से देखे जाते हैं। अब तो माशाअल्लाह घर में
फर्नीचर भी है मगर अपनी पुरानी परंपरा पर डटे हुए हैं। तबियत हमेशा की तरह थी, यानी बहुत खराब।
मैं मिलने जाता तो
बान की खुर्री चारपायी पर लेटे से उठ बैठते और तमाम वक्त बनियान पहने तकिये पर
उकड़ू बैठे रहते। अक्सर देखा कि पीठ पर चारपायी के बानों का नालीदार पैटर्न बना
हुआ है। एक दिन मैंने कहा प्लेटफॉर्म पर जब एनाउंस हुआ कि ट्रेन अपने निर्धारित
समय से ढाई घंटा विलंब से प्रवेश कर रही है तो खुदा की कसम मेरी समझ में ही नहीं
आया कि ट्रेन क्या कर रही है। आ रही है या जा रही है या ढाई घंटे से महज कुलेलें
कर रही है। ये सुनना था कि नुशूर बिगड़ गये।
जोश में बार-बार
तकिये पर से फिसल पड़ते थे। एक बेचैन पल में जियादा फिसल गये तो बानों की झिरी में
पैर के अंगूठे को जड़ तक फंसा के फुट ब्रेक लगाया और एकदम तन कर बैठ गये। कहने लगे
`हिंदुस्तान से उर्दू को मिटाना आसान नहीं।
पाकिस्तान में पांच बरस में उतने मुशायरे नहीं होते होंगे जितने हिंदुस्तान में
पांच महीने में हो जाते हैं। पंद्रह बीस हजार की भीड़ की तो कोई बात ही नहीं।
अच्छा शायर आसानी से पांच सात हजार पीट लेता है। रेल का किराया, ठहरने-खाने का इंतजाम और दाद इसके अलावा। जोश ने
बड़ी जल्दबाजी की। बेकार चले गये, पछताते
हैं।` अब मैं उन्हें क्या बताता कि जोश को 7-8 हजार रुपये महीना... और कार... दो बैंकों और एक
इंश्योरेंस कंपनी की तरफ से मिल रहे हैं। शासन की तरफ से मकान अलग से। यूं इसकी
शक्ल कृपा की जगह कष्ट की-सी है।
गा कर पढ़ने में अब
नुशूर की सांस उखड़ जाती है। ठहर-ठहर कर पढ़ते हैं, मगर
आवाज में अब भी वही दर्द और गमक है। बड़ी-बड़ी आंखों में वही चमक। तेवर और लहजे
में वही खरज और निडरपन जो सिर्फ उस वक्त आता है जब आदमी पैसे ही नहीं, जिंदगी और दुनिया को भी हेच समझने लगे। दस-बारह
ताजा गजलें सुनायीं। क्या कहने। मुंह पर आते-आते रह गया कि डेंचर लगाकर सुनाइये।
आपने तो उन्हें बहुत बार सुना है। एक जमाने में `ये
बातें राज की हैं किबला-ए-आलम भी पीते हैं` वाली
गजल ने सारे हिंदुस्तान में तहलका मचा दिया था, मगर अब `दौलत कभी ईमां ला न सकी, सरमाया मुसलमां हो न सका` वाले शेरों पर दाद के डोंगरे नहीं बरसते। सुनने
वालों का मूड बदला हुआ है। श्रोताओं का मौन भी एक प्रकार की बेआवाज हूटिंग है, अगर उस्ताद दाग या नवाब साइल देहलवी भी अपनी वो
तोप गजलें पढ़ें जिनसे 70-80 बरस पहले छतें उड़
जाती थीं तो श्रोताओं की अरसिकता से तंग आ कर उठ खड़े हों मगर अब नुशूर का रंग बदल
गया। मुशायरे अब भी लूट लेते हैं। हमेशा के मस्त-मलंग हैं। कह रहे थे कि अब कोई
तमन्ना, कोई हसरत बाकी नहीं। मैंने तो हमेशा उन्हें बीमार, कमजोर, बुरे
हाल और निश्चिंत पाया। उनके स्वाभिमान और रुतबे में कोई फर्क नहीं आया। धनी-मानी
लोगों से कभी पिचक कर नहीं मिले। साहब ये नस्ल ही कुछ और थी। वो सांचे ही टूट गये
जिनमें ये मस्त और दीवाने चरित्र ढलते थे।
[ वही "खोया पानी" के अगले, चौथे मुकाम से]

पता नहीं आप कैसे यह सब लिख जाते हैं। हमारे पास जो मशीन है, वह अभी अंदर से बाहर नहीं निकली कभी। कभी बाहर भी रही होगी, उस पर सोच नहीं पाया। लेकिन इतने सालों में आपको पढ़ते हुए लगा, हम आपके कहीं आस पास भी फटकते नहीं लगते। हम अपने दायरे में बंधे ऐसे गधे हैं, जो कभी इस नज़र से गुज़र कर दुनिया, यहाँ की गलियों, आवाज़ों, खड़ंजे को कभी देख भी नहीं पाये। हम अपने अंदर बाहर के लिए इतनी सघनता नहीं महसूस कर पाते। करते भी होंगे, तो कह कहने का सलीका नहीं आता।
ReplyDeleteफ़िर महसूस होता है, सबसे बड़ी बात है अनुभव। हम इन शहरों में रहते हुए अनुभवहीन होती गयी पीढ़ी के स्तम्भ हैं।
भाई शचीन्द्र आर्य मेरे, लिख कहां जाते हैं, लिख तो मुश्ताक़ यूसुफ़ी साहब जाते हैं, हमने तो सिर्फ़ उसकी चिपकाई का काम किया है. फिर भी अच्छा है आपको अच्छा जंचा. शुक्रिया.
Deleteभाई शचीन्द्र आर्य मेरे, लिख कहां जाते हैं, लिख तो मुश्ताक़ यूसुफ़ी साहब जाते हैं, हमने तो सिर्फ़ उसकी चिपकाई का काम किया है. फिर भी अच्छा है आपको अच्छा जंचा. शुक्रिया.
Deleteबहुत सुन्दर ,उम्दा पंक्तियाँ ..
ReplyDeleteजो होनी थी सो बात हो ली, कहारो
ReplyDeleteचलो ले चलो मेरी डोली, कहारो