उसके अगले रोज मौलाना काम पर नहीं आये। दो दिन से मुसलसल बारिश हो रही
थी। आज सुब्ह घर से चलते समय कह आये थे 'बेगम आज तो कढ़ाई चढ़नी चाहिये।' कराची में तो सावन
के पकवान को तरस गये। खस्ता समोसे, करारे पापड़, और कचौरियां। कराची के पपीते खा-खा के हम
तो बिल्कुल पिलपिला गये। शाम को जब दुकान बंद करने वाले थे, एक व्यक्ति सूचना लाया कि कल शाम मौलाना
के पिता का देहांत हो गया। आज दोपहर के बाद जनाजा उठा। चलो अच्छा हुआ, अल्लाह ने बेचारे की
सुन ली। बरसों का कष्ट समाप्त हुआ। मिट्टी सिमट गयी। बल्कि यूं कहिये कीचड़ से उठा
के सूखी मिट्टी में दबा आये। वो पुर्से के लिए सीधे मौलाना के घर पहुंचे। बारिश थम
चुकी थी और चांद निकल आया था। आकाश पर ऐसा लगता था जैसे चांद बड़ी तेजी से दौड़
रहा है और बादल अपनी जगह खड़े हैं। ईटों, पत्थरों और डालडा के डिब्बों की पगडंडियां
जगह-जगह पानी में डूब चुकी थीं। नंग धड़ंग लड़कों की एक टोली पानी में डुबक-डुबक
करते एक घड़े में बारी-बारी मुंह डाल कर फिल्मी गाने गा रही थी। एक ढही हुई झुग्गी
के सामने एक बहुत बुरी आवाज वाला आदमी बारिश को रोकने के लिए अजान दिये चला जा रहा
था। हर लाइन के आखिरी शब्द को इतना खींचता जैसे अजान के बहाने पक्का राग अलापने की
कोशिश कर हो। कानों में उंगली की पोर जोर से ठूंस रखी थी ताकि अपनी आवाज की यातना
से बचा रहे। एक हफ्ते पहले इसी झुग्गी के सामने इसी आदमी ने बारिश लाने के लिए
अजानें दी थीं। उस वक्त बच्चों की टोलियां घरों के सामने 'मौला मेघ दे! मौला पानी दे! ताल, कुएं, मटके सब खाली मौला!
पानी! पानी! पानी!' गातीं और डांट खातीं फिर रही थीं।
अजीब बेबसी थी। कहीं चटाई, टाट, और अखबार की रद्दी से बनी हुई छतों के पियाले
पानी के लबालब बोझ से लटके पड़ रहे थे और कहीं घर के मर्द फटी हुई चटाइयों में
दूसरी फटी चटाइयों के जोड़ लगा रहे थे। एक व्यक्ति टाट पर पिघला हुआ तारकोल फैला
कर छत के उस हिस्से के लिए तिरपाल बना रहा था, जिसके नीचे उसकी बीमार मां की चारपायी थी।
दूसरे की झुग्गी बिलकुल ढेर हो गयी थी। उसकी समझ में नहीं आ रहा था मरम्मत कहां से
शुरू करे, इसलिए
वो एक बच्चे की पिटाई करने लगा।
एक झुग्गी के बाहर बकरी की आंतों पर बरसाती मक्खियां खुजलटे कुत्ते के
उड़ाये से नहीं उड़ रही थीं। ये दूध देने वाली मगर बीमार और दम तोड़ती हुई बकरी की
आंतें थी जिसे थोड़ी देर पहले उसके दो महीने के बच्चे से एक गज दूर तीन पड़ौसियों
ने मिलकर हलाल किया था ताकि छुरी फिरने से पहले ही खत्म न हो जाये इसका खून नालों
और नालियों के जरिये दूर-दूर तक फैल गया था। वो तीनों एक दूसरे को बधाई दे रहे थे
कि एक मुसलमान भाई की मेहनत की कमाई को हराम होने से बाल-बाल बचा लिया। मौत के
मुंह से कैसा निकाला था उन्होंने बकरी को, झुग्गियों में महीनों बाद गोश्त पकने वाला था।
जगह-जगह लोग नालियां बना रहे थे जिनका उद्देश्य अपनी गंदगी को पड़ौसी की गंदगी से
अलग रखना था।
एक साहब आटे की भीगी बोरी में बगल तक हाथ डाल-डाल कर देख रहे थे कि
अंदर कुछ बचा भी है या सारा ही पेड़े बनाने योग्य हो गया। सबसे जियादा आश्चर्य
उन्हें उस समय हुआ जब वो उस झुग्गी के सामने से गुजरे, जिसमें लड़कियां शादी के गीत गा रही थीं।
बाहर लगी हुई कागज की रंग-बिरंगी झंडियां तो अब दिखाई नहीं दे रही थीं लेकिन उनके
कच्चे रंगों के लहरिये टाट की दीवार पर बन गये थे। एक लड़की आटा गूंधने के तस्ले
पर संगत कर रही थी कि बारिश से उसकी ढोलक का गला बैठ गया था।
अम्मा! मेरे बाबा को भेजो री के सावन आया!
अम्मा! मेरे भैया को भेजो री के सावन आया!
हर बोल के बाद लड़कियां अकारण बेतहाशा हंसतीं, गाते हुए हंसतीं और हंसते हुए गातीं तो
राग अपनी सुर सीमा पार करके जवानी की दीवानी लय में लय मिलाता कहीं और निकल जाता।
सच पूछिये तो कुंवारपने की किलकारती, घुंघराली हंसी ही गीत का सबसे अलबेला हरियाला अंग
था।
एक झुग्गी के सामने मियां-बीबी लिहाफ को रस्सी की तरह बल दे कर निचोड़
रहे थे। बीबी का भीगा हुआ घूंघट हाथी की सूंड़ की तरह लटक रहा था। बीस हजार की इस
बस्ती में दो दिन से बारिश के कारण चूल्हे नहीं जले थे। निचले इलाके की कुछ
झुग्गियों में घुटनों-घुटनों पानी खड़ा था। बिशारत आगे बढ़े तो देखा कि कोई झुग्गी
ऐसी नहीं जहां से बच्चों के रोने की आवाज न आ रही हो। पहली बार उन पर खुला कि
बच्चे रोने का आरंभ ही अंतरे से करते हैं। झुग्गियों में आधे बच्चे तो इस लिए पिट
रहे थे कि रो रहे थे और बाकी आधे इसलिए रो रहे थे कि पिट रहे थे।
वो सोचने लगे, तुम तो एक व्यक्ति को धीरज बंधाने चले थे। यह किस
दुख सागर में आ निकले। तरह-तरह के खयालों ने घेर लिया। बड़े मियां को तो कफन भी
भीगा हुआ नसीब हुआ होगा। यह कैसी बस्ती है। जहां बच्चे न घर में खेल सकते हैं,
न बाहर। जहां
बेटियां दो गज जमीन पर एक ही जगह बैठे-बैठे पेड़ों की तरह बड़ी हो जाती हैं जब ये
दुल्हन ब्याह के परदेस जायेगी तो इसके मन में बचपन और मायके की क्या तस्वीर होगी?
फिर खयाल आया,
कैसा परदेस, कहां का परदेस। यह
तो बस लाल कपड़े पहन कर यहीं कहीं एक झुग्गी से दूसरी झुग्गी में पैदल चली जायेगी।
यही सखियां सहेलियां 'काहे को ब्याही बिदेसी रे! लिखी बाबुल मोरे!' गाती हुई इसे दो गज पराई जमीन के टुकड़े
तक छोड़ आयेंगी। फिर एक दिन मेंह बरसते में जब ऐसा ही समां होगा, वहां से अंतिम दो गज
जमीन की ओर डोली उठेगी और धरती का बोझ धरती की छाती में समा जायेगा। मगर सुनो! तुम
काहे को यूं जी भारी करते हो? पेड़ों को कीचड़ गारे से घिन थोड़ा ही आती है।
कभी फूल को भी खाद की बदबू आई है?
उन्होंने एक फुरेरी ली और उनके होठों के दायें कोने पर एक कड़वी-सी,
तिरछी-सी मुस्कराहट
का भंवर पड़ गया। जो रोने की ताकत नहीं रखते वो इसकी तरह मुस्करा देते हैं।
उन्होंने पहले इस अघोरी बस्ती को देखा था तो कैसी उबकाई आई थी। अब डर
लग रहा था। भीगी-भीगी चांदनी में यह एक भुतहा नगर प्रतीत हो रहा था। जहां तक नजर
जाती थी ऊंचे-नीचे बांस ही बांस और टपकती चटाइयों की गुफायें; बस्ती नहीं बस्ती का
पिंजर लगता था, जिसे परमाणु धमाके के बाद बच पाने वाले ने खड़ा किया हो। हर गढ़े में
चांद निकला हुआ था और भयानक दलदलों पर भुतहा किरणें अपना छलावा नाच नाच रही थीं।
झींगुर हर जगह बोलते सुनायी दे रहे थे और किसी जगह नजर नहीं आ रहे थे। भुनगों और
पतंगों के डर से लोगों ने लालटेनें गुल कर दी थीं। ठीक बिशारत के सर के ऊपर से
चांद को काटती हुई एक टिटहरी बोलती हुई गुजरी और उन्हें ऐसा लगा जैसे उसके परों की
हवा से उनके सर के बाल उड़े हों। नहीं! यह सब कुछ एक भयानक सपना है। जैसे ही वो
मोड़ से निकले, अगरबत्तियों और लोबान की एक उदास-सी लपट आई और आंखें एकाएकी चकाचौंध
हो गयीं। या खुदा! होश में हूं या सपना है?
क्या देखते हैं कि मौलाना करामत हुसैन की झुग्गी के दरवाजे पर एक
पेट्रोमेक्स जल रही है। चार-पांच पुर्सा देने वाले खड़े हैं और बाहर ईंटों के एक
चबूतरे पर उनका सफेद बुर्राक घोड़ा बलबन खड़ा है। मौलाना का पोलियो-ग्रस्त बेटा
उसको पड़ोसी के घर से आये हुए मौत के खाने की नान खिला रहा था।
[ मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी साहब की "खोया पानी" के तीसरे मुकाम से. ]

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