कहानी के बारे में कोई नहीं जानता कि कहीं से निकलकर वह कहीं
पहुंचेगी. कहीं पहुंचती है तो मुंह बिराती दिखती कि देखो, पहुंच गई है, लेकिन फिर,
तुम्हारे मन को लुभानेवाली अमीरी की वो कहानी नहीं है. ज्यादातर यहीये होता. कि
पहुंची हुई कोई होती, मगर वह नहीं होती जिसके पहुंचने की कामना थी. यह और बात है
कि कहीं न कहीं उसमें आकर एक लड़का जुड़ जाता. या और लड़की. कहते हम कहानी नहीं, वास्तविक
हैं. मगर होते नहीं. अलबत्ता तलाश वास्तविकता की ही होती. कि लड़के के हाथ कुछ
लग जाये. या वास्तविकता के. मगर वास्तव में ऐसा कुछ नहीं होता. ज्यादातर यह
होता कि दोनों भूले, और भुले हुए, किसी और ही सफ़र पर निकल जाते, और बहुत आगे जाकर
फिर कभी उनका मिलना होता भी तो उसी भुले की अजनबियत में. लड़का खुशी की उत्तेजना में जल्दी-जल्दी बताने लगता, मुलुक तो वही पहचाना लगता है, शायद मैं ही अब वह पुराना नहीं रहा. लड़की संकोच में कहीं और झांकती बुदबुदायी कहती तुम्हें पहचान रही हूं, मगर क्या मालूम शायद सिर्फ़ नाम की पहचान वाला अपनापा हो. फिर बहुत ज़माने की पगडंडियों पर एक-दूसरे के बगल वह अजनबियों के मानिंद सांस ताने चलते और दोनों में से कोई यह नहीं कहता कि उनकी अपनी कहानी कहीं छूट गई है. कहानी भी नहीं कहती कि वह छुटी हुई है.
मैं, सबसे बाहर, सिर्फ़ अपने पैरों की उंगलियों के अगोर के मुहाने कांपता खुद को ख़बरदार करता कि जिस बिंदु सब हेरा जाये, तुम लम्बी सांस खींचकर वहां से कहानी शुरु करना. हेराये की लम्बी दूरी खींच निकालो फिर तब कहीं उनींदे में आंख खोलकर खुद से पूछना, उपन्यास कहां शुरु होगा.
कहानी मुस्कराकर मुंह फेर ले तब समझना हेराना व्यर्थ नहीं गया.
ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "६८ वें सेना दिवस की शुभकामनाएं - ब्लॉग बुलेटिन " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !
ReplyDeleteआपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शनिवार 23 जनवरी 2016 को लिंक की जाएगी ....
ReplyDeletehttp://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!