इस धूप से निकल उस अंधेरे, और उस सियाह से इस उजाले, चोटखायी बेहया
मुहब्बतों की तरह, घर में गंदबहार आंख-मिचौनी खेलती रहती है. एक गौरैया अपना गाना
भूलकर खिड़कियों पर आकर गुम हो जाती है, उस गुम में सब भूल गया हूं की
भावुकता में मचलकर मैं भी, पुरानी यादों पर पर्दा खींच, मन के रेगिस्तान से कोई
भटका ऊंट रंजु की ओर रवाना करते, बहकता हूं, 'ये क्या जगह है, रंजु, ये कौन-सा
दयार है.. इंतिज़ार साहब कहीं यहीं आस-पास हैं का मीठा ख़़याल था, कि
सुपारी-ज़र्दे की टोह में निकल हैं, लौट आएंगे, अब दीख रहा है कि कोई नहीं लौटता
की लम्बी तिलिस्मी बारात लौट रही है, अंधेरी रातों की जाने कैसी तो बहकी लपटों
की छूटी लालटेनें, और कनपटियों पर बजता कोई अबूझ-सा संगीत, इंतिज़ार साहब की कहीं
कोई हवा नहीं.. ये कौन राग है, रंजु, इसके बाबत तो कभी तुमने कुछ बताया नहीं..'
रंजु बिना मेरी ओर हुए, शंकर हुसैन के लता की फ़ासलों से गुज़रती जाती
है, पीछे के तैरतों में गुम मैं बातों के इशारे बीनता हूं, 'तुम कब राग जाने, या
यादों के घनेरे.. जाने होते तो मैं बीस साल बाद की वहीदा रहमान-सी बार-बार लौटकर
आने की बेहया नहीं होती, और नब्बे किलो की देह में तुम भी इस कदर बेसबब गौरैया नहीं
होते.. राग नहीं जानोगे तो इसी सूरत भटके फिरोगे, और इंतिज़ार को कोई ठिकाना नहीं
होगा, तीन हज़ार सालों में भी नहीं..'
मैं घबराहट में जल्दी-जल्दी पद्मा तलवलकर के राग केदार के गुर में भजन भांजने लगूंगा,
'हमको मन की शक्ति देना, मन विजय करे, दूसरों की जय से पहले, खुद की जय करे..',
मगर जल्दी ही फिर ये भी दिखेगा कि गौरैया अपने गुम से बाहर नहीं आएगी, याकि रंजु,
या इंतिज़ार का ही कोई सुराग लगेगा..

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