[दो के आगे..]
फो के फूफा थे, या
रंजी के थे, या सायत सिरिफ दिल की आग थे, तक़लीफ़ में फिसलते तो सुनते हैं जूती
पहनकर दबी आवाज़ गुनगुनाने लगते थे, 'आह को चाहिये एक उम्र असर होने को', सोचकर
हमारा जी माथा केवाड़ी पर माथा पटकने को होता है (मैटाफॉरिकली) कि ये तो अच्छा रहा
तब बाबा मियां कि जिसकी उम्रे नहीं फिर वह अपनी आहों को लेकर कहां जाये, बताइये तो
भला.. और अब ये मत बताने लगियेगा कि बड़ी लम्बी उम्र मिली रही आपको और आह पर आप
ही का विशेषाधिकार रहा, हां? अल्ला
ताला हुजूर की दुनिया में इंसाफ़ होता तो आपको भी कोई मिला रहता बतानेवाला कि
जिनकी उम्र नहीं होती वो भी भरे-भरे हो सकते हैं, विथ आह एंड अल्ला नोज़ व्हॉट
मेनी अदर थिंग्स, यह फिर दीगर बात है कि उसका असर जितना होता हो या नहीं..
कितनी तो मैं
भरी-भरी हूं. हमेशा. कभी भी कोई उंगली बढ़ाकर गिन ले, जीभ छूकर कसम खाती हूं आपकी
सारी गिनती गड़बड़ा न जाये तो अल्ला मियां के आगे मैं माथे को चुन्नी से ढांपकर
अपना नाम बदल लूंगी, एक बार बस आप गिनकर दिखा दो हमें पहले, हां? आह आह आह आह? आपके
बस का नहीं है. किसी के बस का नहीं है. मैं अपने बस की भी नहीं हूं. यही तो दु:ख
है. और जो-जो है उससे अलग. ओह.
सुनते हैं प्राचीन मिस्र
के जाने किस तो प्रांत में कौन-सी तो नदी के मुहाने पर एक नायिका रहती थी वह ऐसे
ही दु:खों की गायिका के तौर पर मिस्र की राजशाही की नज़रों में बेईमान और बदनाम
थी. लाख, या हज़ार, होशियारियों के बावज़ूद राजशाही जब उसका गाना बंद न करा सकी तो
उसे हुक़्म हुआ कि वह या तो काले लबादे ओढ़ना बंद कर दे या फिर अपनी ज़ुबान बदल
ले. गायिका ने तब तक पैरिस नहीं देखा था (पैरिस तब तक फ्रांस ने भी कहां देखा था)
मगर जिस्म के काले लबादे पर एटिट्यूड टांगना तो वह गानों से पहले ही सीख चुकी थी,
कमीनपने में ज़ुबान बदलने की जगह उसने शौहर बदल लिया और कहीं ज़ियादा ज़हीनी-जौहर
में अपना गुनगुनाना जंबूर किये रही. (अब 'जंबूर' का मतलब मुझसे मत पूछियेगा. सायद
जंबूर का कोई मतलब है भी नहीं. सिर्फ़ गानेवाली के अरमानों का मतलब है और अच्छा
है आप उसी से मतलब रखें.)
मैं भी गाना चाहती
हूं. दु:ख के उसी बंदिश को. उसी ज़ुंबिश में. मगर कहां गाऊंगी, कैसे गाऊंगी, मेरा
मतलब होगा जब तो गाऊंगी?
इस नहीं होने की
दुनिया में कितने तो काम छूटे पड़े हैं. मैं देखती हूं और आह आह आह के भूगोल में
भागती अपना-सा सिर लिए फिर बैठी रहती हूं. कठफोड़वा होती तो जाने अब तक कहां कैसे
और कितने गहरे सुराख भरे होते! मगर
नहीं हैं. सिर्फ़ मैं ही हूं. भरी. भरी भरी भरी भरी. और उसके बाद भी बहुत दूर और
भीतर, गहरे तक. कितना तो काम है और मैं हूं कि सादा मारी का बिस्कुट तक नहीं खा
सकती. अकेला चना भांड़ नहीं फोड़ता का मुहावरा तक नहीं आजमा सकती. जबकि भांड़ क्या
मैं समूचा भंभाड़ फोड़ने के फिराक, और फितरत में भरी भरी हूं.
क्या कभी ऐसा होगा
कि इस न होने की काली दुर्गम पगडंडियों से बाहर मैं ढलते फरवरी के उजालों में
नहायी एकदम से चहकती सामने आन खड़ी होऊंगी कि रंजी फुआ सुख के घबराहट में लजाकर
लाल कपड़ों में लपेटा नकली स्विस चॉकलेट बाहर निकाल मेरे होश फाख़्ता कर देंगी कि ले,
भकोस, कुलच्छनी, कि तू भी जान ले कि दुनिया में चबाकर धन्य होने के लिए सिर्फ़
मारी की बिस्कुट ही नहीं है?
मैं नकली स्विस
चॉकलेट चबाना चाहती हूं. देर तक. काली दुर्गम पगडंडियों से उतरकर फटे मोज़े और सस्ते
जूतों में मैं स्कूल पहुंचना चाहती हूं. दूर तक.
नहीं होने की इन लम्बी
नशीली रातों के बाद मैं होने के सरल सुहानेपन में सच्ची-मुच्ची के होना चाहती हूं.
भां-भां रोने के हद तक. पिलीच?
(बाकी..)

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