एक : जागकर दुनिया
सिरहाने के तकिये और
कनपटियों के बीच दूर उड़ाती धूल / धुआं गुबार छूटी भागती निकलती है रेल / सुई के गिरने-सा शोर कनपटियों पर / कितना घनघोर / बजता रहता देर दूर तक
भिनसारे के अंधेरे कुएं मैं पैर रखता / मौन के सन्न सपसपाहट में परदा / उतरता जाता दुनिया का धीरे धीरे.
भिनसारे के अंधेरे कुएं मैं पैर रखता / मौन के सन्न सपसपाहट में परदा / उतरता जाता दुनिया का धीरे धीरे.
दो : कविता संग्रह
छद्म-नाम प्रकाशक के
यहां ज़माने का छूटा दु:ख-संग्रह हूं / कविता पढ़ते-पढ़ते गरदन भर आती घबराकर हंसने
लगता / डाक्टर के बरजने के बाद जैसे बीड़ी पीती मां खांसती सोने लगती
अप्रकाशित चिल्लर
हैं गिरे यहां-वहां / दुआर पर औ' टांड़ के अंधारों व चीकट होती शर्ट के
किनारों में / भरा-भरा कितने ज़मानों के क़िस्से / घोंटाये बीड़ी-सा जल रहे / सुलगते भासा के अप्रकाशित.
तीन : मुलाक़ात
हमेशा चोरों की तरह
मुंह पर हाथ दाबे दबी आवाज़ शर्मिंदगी का पोस्टर सजाता करीब / पहुंचता एकदम से दूर जाऊंगा कि अरे / इतना दु:ख है ओह, भभकता भव्य है
धूप के मुंह गुलाल
का रुमाल धरती तुम चिड़िया-सी चहचहाने लगना / फड़फड़ाने, ओह हमेशा तुम कैसा मज़ा बहलते, मेरे अनइंटेशनल इंटरनेशल फंटूश?
चार : हिन्दी
साहित्य का गंवार
यहां मत देखिए सब गंवार हैं / उस कक्षा में दबे हुए कुर्सी चढ़े हुए / सभागार की चाय में जनता क्या चाहती है की झांय में / छत से
कुछ लटक रहा है रोज़ थोड़ा और दरक रहा / दवाखाने
में दीवाने में किताब में बीच जनता की रिपोर्टिंग लेकर आ रहा हूं गुरु की आब में / गुड़ में गोबर में फटे दूध और फटी धूप सभ्यता की सूप में / मत देखिए
सब वही संसार है मत
देखिए / गं गं गं / है.
पांच : अमुख्यधारा
कविता से बाहर खड़ी
पंक्तियों का मालूम नहीं किधर होता घर / जाड़े की बरसाती सांझों में कभी दूर दीखती हैं झिलमिल
/ उम्मीद और चतुराई को नाकारा बनातीं / झेलमझेल भीजी गलियों में मुंह पर कपड़ा दाबे
चुपचाप पहाड़ चढ़तीं
सोचता हूं किसी दिन
हिम्मत करुंगा / नज़दीक जाकर टोहूंगा और कैसा है सब घर में / और अरे नाम तो मैंने पूछा ही नहीं
जबकि बखूबी जानता
हूं कविता से बाहर खड़ी पंक्तियों का कहीं नाम नहीं होगा / हंसकर सिर हिला देने की मनुष्यता होगी / और मुंह पर कपड़ा दाबे चुपचाप पहाड़ चढ़ते जाने की.

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