Friday, March 11, 2016
पुरबिया का भक्तिगान..
क्या करोगे कर लो पछाड़ देंगे छिले हुए हैं चार चोट और खाएंगे मर जाएंगे मुक्कों
में भर जाएंगे अभी तुमने समझा क्या है दिख रहे हैं दिखा देंगे चढ़ लो पहाड़ गिरा
देंगे अबे अभी बात निकली कहां है जात हमारी हमसे बिछली कहां है. नल है नाली है
नेक़चलनी के वादों में मुंह सिला हुआ है, निकलने को कपड़े नहीं हैं, लुंगी धुला
हुआ है, मगर मुग़ालते में मत रहो, अभी रात लम्बी है बात लम्बी है, और मुस्करा
रहे हैं के फेर में मत रहो हम तो भौत ही नंगे हैं पूरा खानदान लफंगा है, और असलहे
की फजीहत नहीं है, हमारी जीभ ही सबसे बड़ा खम्भा है, लिटाकर हुमच देंगे रगड़कर
कचर देंगे, अम्मा बुलाओगे अबे अपनी ख़बर नहीं पाओगे, जी रहे हैं गुस्सा पी रहे
हैं सिल-सिलकर संभाले हुए हैं, छूटना शुरु करेंगे तो बहुत तिल-तिलकर टूटोगे,
सीटियां सरसरायेंगी, फटे पोस्टरों में तुम नहीं सटोगे, हमें जान नहीं रहे खालिस खांटी हैं, मुर्चाइल टौटक कांटी हैं, घुस जाएंगे घुसा देंगे, अहा सिर से ठेहुना ले सजा देंगे, हं..

सूरज है सबेरा है, बिल्लियों का फेरा है, हिल गए तो जान लेंगे मिल गए पहचान लेंगे, धुलाई है रंगाई है, तीन का तेरह और तैंतीस की बोली है, हेहर हल्ला है थेथर पिल्ला है रात का बासी अधूरा चिल्ला है, रौ है रां है भागी महतारी की बां है, चूक है पिचुक है धां छूटा बंदूक जाने कैसा भारी संदूक है, पान के पत्ते हैं हरे महीन गत्ते हैं, चुन्नी है चूड़ी है जाके पोस्टर में छिपी पेंटेड पूड़ी है, लड़ी है लड़ाकिन है मुंह मूंदे है जब ले बांकिन है, धन्यता का खाली कटोरा है बहुत बहुत गोरा है, मालूम नहीं कौन किसकी भासा है फिर भी क्यों आसा है, धम्म है छम्म है इतना ढंग है, पियरायी सुबही में खूंखार खांसी है पांख की अटकी फांसी है, अदाकारी भरा-भरा भारी, बस भरोसा नहीं है..
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