मालूम नहीं कैसे
होती है, लिखने वाले ने लिखने से पहले क्या सोचकर, और किस सुरुरी सुर में शुरु
किया होता है कि इतने सफ़रों पर निकलती चलती है और कान पर एक पसीना नहीं उतरता..
होती है, वह नहीं जिसकी यहां तस्वीर लगा रखी है, इसकी भी एक कहानी है, वह अलहदा फिर कभी. जिसकी अभी है उसकी बहुत तस्वीर नहीं. होती भी तो उसे देखना आंखों को शर्मिंदा करता. वह नहीं होकर होने के गुरुर में होती.
होती है, ईस्वी सन् 2000 की तर्जुमाबंद, चार सौ में पांच कम की कीमत के ठप्पे में छपी, किसी इन्द्रध्वस्त प्रकाशक का ईनाम होती है जिससे प्रूफ की इतनी और ऐसी ग़लतियां झांकती कि नेपोलियन के जनरल अपनी वाटरलू के हार की शर्मिंदगी भूल जाएं, बेमुरव्वत छपाई और बेगैरत बुनाई के बावज़ूद होती है, उड़ती, बुलबुल-सा गुनगुनाती, अपनी गरीबी में इतना अमीर कि आपको अपना होना शर्मसार करने लगे, भक्क-सा चमकौंधा उजाला हो, जिसमें नवाब बेगम हंसकर पुकारती दिखें, 'ऐ बी तुम अंदलीब हज़ार दास्तान तो नहीं-?' और फिर आसमान पर घनेरा काला रंग फिर जाये.. यूं फिरा जाये कि आप चाक चाक दिल को धरने की जगह ढूंढ़ते फिरें..
होती है, ईस्वी सन् 2000 की तर्जुमाबंद, चार सौ में पांच कम की कीमत के ठप्पे में छपी, किसी इन्द्रध्वस्त प्रकाशक का ईनाम होती है जिससे प्रूफ की इतनी और ऐसी ग़लतियां झांकती कि नेपोलियन के जनरल अपनी वाटरलू के हार की शर्मिंदगी भूल जाएं, बेमुरव्वत छपाई और बेगैरत बुनाई के बावज़ूद होती है, उड़ती, बुलबुल-सा गुनगुनाती, अपनी गरीबी में इतना अमीर कि आपको अपना होना शर्मसार करने लगे, भक्क-सा चमकौंधा उजाला हो, जिसमें नवाब बेगम हंसकर पुकारती दिखें, 'ऐ बी तुम अंदलीब हज़ार दास्तान तो नहीं-?' और फिर आसमान पर घनेरा काला रंग फिर जाये.. यूं फिरा जाये कि आप चाक चाक दिल को धरने की जगह ढूंढ़ते फिरें..
'कभी के दिन बड़े
कभी की रातें.' महरू दुपट्टे से आंखें पोंछती बोलतीं.
गोवनीज़ आया
फ्लोमीना परेशांहाल भिड़ी-गिरी बकटूट सवाल दागती, 'मेम साहिब आज फिर कोई सपना गिरा?'
सपना आया नहीं, सपना गिरा.
गिरते रहते थे. सपने. और लोग. और फिर जिंदगी से उम्मीद करते थे. दोपहर के सन्नाटे में और रात के वक़्त लम्बी-चौौड़ी इमारत भायं-भायं करती. और पसलियों में पढ़नेवाले के उम्मीदों से तर-ब-तर, बेसहारा पखेरु के पर फड़फड़ाते. बेसाख्ता लाचार हाथ से किताब गिर जाती और ख़यालों की एक पुरानी कालीखपुती लालटेन में एक ज़रा-सी रोशनख़्याल दमक कुलांचें मारती कहीं निकलने को बेदम होती दिखती, कि जब कुछ नहीं होता तब भी एक किताब होती है..
गिरते रहते थे. सपने. और लोग. और फिर जिंदगी से उम्मीद करते थे. दोपहर के सन्नाटे में और रात के वक़्त लम्बी-चौौड़ी इमारत भायं-भायं करती. और पसलियों में पढ़नेवाले के उम्मीदों से तर-ब-तर, बेसहारा पखेरु के पर फड़फड़ाते. बेसाख्ता लाचार हाथ से किताब गिर जाती और ख़यालों की एक पुरानी कालीखपुती लालटेन में एक ज़रा-सी रोशनख़्याल दमक कुलांचें मारती कहीं निकलने को बेदम होती दिखती, कि जब कुछ नहीं होता तब भी एक किताब होती है..
और बहुत मर्तबा ख़ुद
पढ़ने वाला भी उसकी संगत में नहीं होता, सिर्फ़ एक ज़रा धड़कता दिल होता, और
धूप में नहाई दूर दूर दूर तक निकलती समय की पगडंडी होती है, और राह में मिलते
झकझोर फुहारे होते हैं, और सबकुछ खाक़ करते अंगारे..
(मलिका जान क़ुर्रतुलजी ऐनीजी की 'गर्दिशे रंगे चमन' पढ़ रहा हूं.)

हिंदी का कोई प्रकाशक प्रूफरीडरों को पैसे नहीं देना चाहता। ऐसा करना ठीक भी होता अगर लेखक लोग कंप्यूटर पर टाइप करना जानते होते। मगर हिंदी में कंप्यूटर टाइपिंग इतनी आम नहीं है।
ReplyDeleteऑस्ट्रिया-जर्मनी में प्रूफ़रीडरों का काम सिर्फ़ हिज्जे सुधारना ही नहीं, भाषा सुधारना भी होता है, ऐसा अमृतजी मेहता ने बताया था।
आपकी "अजाने मेलों में" का बैक-कवर देखिए, पहले पैरा की आख़िरी लाइन है "...फिर ढूँढ़ते फिरूँगा.."
देखिए ढूंढने में ञ की आवाज़ नहीं है इसलिए चंद्रबिंदु नहीं आएगा।
फिर आख़िरी लाइन है ...तक़लीफ़ों के किन सिलसिलों में होना है..
इधर तकलीफ़ शब्द में क को हलक़ में ज़्यादा पीछे से नहीं बोलेंगे इसलिए क पर नुक़्ता नहीं लगाएँगे।
अबे, तो परकासक से किताब मंगवाकर उसे दुरुस्त करना चाहिए था न.. तुम बाकी के काम छोड़ो, खुद परकासक होइये जाओ अब.
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