देखा जाए तो इनसान – अमीर हो या गरीब, यहां से वहां तक एक ही जैसा
होता है.. पिताजी का कहना सही होता है. वाकई गांववाले, गांव के बाहरवाले, मातंग
टोले के, महार टोले के सारे गरीब एक ही जैसे रहते हैं. कपड़े भी एक ही ढंग के,
हंसते भी हैं तो एक ही जैसी आजिजी से. सब कमोबेश एक जैसे. जैसे, संसार भर के सारे
गरीबों का एक बड़ा ग्रुप फोटो, जिसमें दाएं, बाएं बिलकुल आखिर तक, एक कूल्हे पर
जांघ मोड़कर पासवाले से चिपके बैठे हैं और इस चिंता में कैमरे की तरफ देख रहे हैं
कि कहीं हम फ्रेम से कट न हो जाएं. या बिलकुल अंतिम पंक्ति में खड़े होनेवालों के
भी ऊपर बेंच पर स्टूल रखकर उस पर खड़े. हमारी ओर कोई सच्ची आस्था से देख रहा
है, इस पर भी उन्हें यकीन नहीं होता. यदि हम इन्हीं को हाथ के इशारे से बुलाते
हैं, तब भी ये यह सोचकर पीछे मुड़कर देखते हैं कि अपने पीछेवाले को बुलाया होगा.
और ये गरीब लोग यह भी तुरंत जान जाते हैं कि हमारी ओर देखकर इन ऊपरी दर्जे के
लोगों को तरस आता है.
पिताजी भावडू को अपनी गीता सुनाते ही रहते हैं: देखो, जिंदगी वैसे भी कठिन, बहुत कठिन होती है. चिलचिलाती धूप में पेट भरने के लिए कुछ पाना इन गरीब मेहनतकशों की रगों में बचपन से ही इस कदर घुला रहता है कि इनके जैसी जीने की असल खुशी किसी को नहीं मिलती. हमारे संत तुकाराम कहते हैं न मन को कीजिए प्रसन्न. यही है वो. घर मतलब होता क्या है? बताओ. चूल्हा, बच्चे, बीवी, मां-बाप, पड़ोस, सुरक्षित दीवारें, प्यार का स्पर्श, नींद – या इससे ऊंचा या बड़ा, महान, सजीला कुछ होता है? चींटी बनकर शक्कर खाएं. निजवस्तु से साक्षात्कार करें. यही तो समझना है भावड़या कि यह निजवस्तु क्या है. किसी गरीब किसान को देखो. दरवाजे पर खड़े कुत्ते को, गोठ के बैल को, भैंस को वह अपना ही समझता है. उनको रोटी का टुकड़ा, चारा, पानी पहले देता है फिर खाने बैठता है. और तो और, हमारे जागीर के खेत की मेंड पर नीम का इतना बड़ा दरख्र्त देखते हैं न हम? वह छोटा-सा उंगली भर का पौधा था, तब से दादी ने उसे अपने हिस्से का घूंट-घूंट पानी पिलाकर उसे सींचा और जिलाया है.
मैं हमारे घर के पीछे रहनेवाली सरूचाची का घर नजरों के सामने लाता हूं. एक ही भैंस. उसकी सेवा करके दूध, दही, मक्खन, छाछ, रोज का मथना. रोज गड़ुआ पर मक्खन जमा कर-करके महीने भर का जमा घी चार कोस बाजार में ले जाकर खूप में खड़े रहकर बेचना. घी से मिले दो रुपये का नोट सबकी सहमति से यह तय होने के बाद ही तुड़वाया जाता है कि किस-किस पर खर्च करना है. इसमें पांच साल की बच्ची की रिबन का एक पैसा भी शामिल होता है.
घर-घर में चूल्हे सुलगते हैं. अंधेरा होते ही खेत से थककर देर से लौटनेवाले छोटे किसानों के घर, जरुरत के हिसाब से बने – छोटे-छोटे, खप्परों से धुआं उगलते, खपरैल, मिट्टी के बने, एकमंजिला, कभी-कभी दुमंजिला, साधारण-से, धाबे के, रसोई के धुएं से सराबोर. गांव के निन्यान्नबे प्रतिशत किसान ऐसे ही थे- दो-चार बीघा भूमि के मालिक. अपने छोटे-से खेत को हिस्सा कहते थे. बाप-दादाओं के जमाने से भाइयों-भाइयों में बंटवारा होते-होते अपने हिस्से आया धरती माता का ये छोटा-सा टुकड़ा. साल-भर की मेहनत के बाद दो जून रोटी का भरोसा..
(नेमाड़े का उपन्यास 'हिन्दू: जीने का समृद्ध कबाड़' का एक टुकड़ा)

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